Gita Chapter 6, Verse 1-4
श्री भगवान ने कहा - जो मनुष्य बिना किसी फ़ल की इच्छा से अपना कर्तव्य समझ कर कार्य करता है, वही संन्यासी है और वही योगी है, न तो अग्नि को त्यागने वाला ही सन्यासी होता है, और न ही कार्यों को त्यागने वाला ही योगी होता है। हे पाण्डुपुत्र! जिसे संन्यास कहते हैं, उसे ही तू योग (परब्रह्म से मिलन कराने वाला) समझ, क्योंकि इन्द्रिय-सुख (शरीर के सुख)की इच्छा का त्याग किये बिना कभी भी कोई मनुष्य योग(परमात्मा)को प्राप्त नहीं हो सकता है। मन को वश में करने की इच्छा वाले मनुष्य को योग की प्राप्ति के लिये कर्म करना कारण होता है, और योग को प्राप्त होते-होते सभी सांसारिक इच्छाओं का अभाव हो जाना ही कारण होता है। जब मनुष्य सभी सांसारिक इच्छाओं का त्याग करके, न तो शारीरिक सुख के लिये कार्य करता है, और न ही फ़ल की इच्छा से कार्य में प्रवृत होता है, उस समय वह मनुष्य योग मे स्थित कहलाता है।
श्री भगवान ने कहा - जो मनुष्य बिना किसी फ़ल की इच्छा से अपना कर्तव्य समझ कर कार्य करता है, वही संन्यासी है और वही योगी है, न तो अग्नि को त्यागने वाला ही सन्यासी होता है, और न ही कार्यों को त्यागने वाला ही योगी होता है। हे पाण्डुपुत्र! जिसे संन्यास कहते हैं, उसे ही तू योग (परब्रह्म से मिलन कराने वाला) समझ, क्योंकि इन्द्रिय-सुख (शरीर के सुख)की इच्छा का त्याग किये बिना कभी भी कोई मनुष्य योग(परमात्मा)को प्राप्त नहीं हो सकता है। मन को वश में करने की इच्छा वाले मनुष्य को योग की प्राप्ति के लिये कर्म करना कारण होता है, और योग को प्राप्त होते-होते सभी सांसारिक इच्छाओं का अभाव हो जाना ही कारण होता है। जब मनुष्य सभी सांसारिक इच्छाओं का त्याग करके, न तो शारीरिक सुख के लिये कार्य करता है, और न ही फ़ल की इच्छा से कार्य में प्रवृत होता है, उस समय वह मनुष्य योग मे स्थित कहलाता है।
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